*5 साल सेवा के बाद किया वट-पेड़ का वैदिक विवाह, गवालू के कथाव्यास कैलाश शास्त्री ने दिया अनोखा प्रकृति प्रेम का संदेश*
कस्बे के निकटवर्ती गांव गवालू में शनिवार सुबह बड़ और पीपल का वैदिक विधि से विवाह करवाया गया। आज के समय में जब पेड़ों की कटाई और पर्यावरण प्रदूषण चिंता का विषय बन चुका है, ऐसे में गवालू गांव के प्रसिद्ध कथाव्यास कैलाश शास्त्री ने प्रकृति प्रेम और पर्यावरण संरक्षण का अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत किया है। शास्त्री ने न केवल पीपल और वटवृक्ष (बड़) के पौधे रोपे, बल्कि उनकी पांच वर्षों तक सेवा-संरक्षण करके उन्हें इस काबिल बनाया कि वैदिक विधि से उनका विवाह संपन्न कराया।
यह कार्यक्रम सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि समाज को एक गहरी सीख देने वाला प्रयास था। विवाह समारोह में फूलों, तोरण, ढोल-नगाड़ों और पारंपरिक वेषभूषा में सजे ग्रामीणों की उपस्थिति ने इसे एक भावपूर्ण उत्सव बना दिया। कार्यक्रम में गांव के सैकड़ों लोग उपस्थित रहे और सभी ने इस प्रयास की भूरी-भूरी प्रशंसा की।
वृक्ष सेवा को बनाया जीवन का उद्देश्य
शास्त्री ने बताया कि पांच साल पहले उन्होंने गवालू गांव के बाहर पीपल और वट के दो पौधे लगाए थे। उन्होंने नियमित रूप से उनकी देखभाल की, उन्हें पानी दिया, खाद डाली और समय-समय पर उनकी रक्षा भी की। शास्त्री का मानना है कि "जिस तरह हम अपने बच्चों का पालन-पोषण करते हैं, वैसे ही पेड़ों की भी सेवा करना जरूरी है।"
वैदिक रीति-रिवाजों से संपन्न हुआ विवाह
पांच वर्षों के सेवा उपरांत जब दोनों वृक्ष पूर्णरूप से विकसित हो गए, तो शास्त्री जी ने उनकी 'विवाह' की योजना बनाई। विवाह संस्कार को पूर्णतः वैदिक विधियों से संपन्न किया गया। पंडित ललित व्यास (छोटी खाटू) ने विवाह के मंत्र पढ़े और विवाह की सभी विधियां संपन्न करवाईं।
इस अवसर पर शास्त्री जी के पिता श्री धनराज खांडल ने कन्यादान की रस्म निभाई, जिससे यह कार्यक्रम और भी अधिक भावनात्मक और पारंपरिक बन गया।
प्रकृति के लिए प्रेरणा बनता आयोजन
इस विवाह समारोह के माध्यम से कैलाश शास्त्री ने समाज को यह संदेश देने का प्रयास किया कि वृक्ष केवल ऑक्सीजन देने वाले जीव नहीं, बल्कि हमारे परिवार का हिस्सा हैं। उनके संरक्षण और संवर्धन के लिए सभी को मिलकर प्रयास करने चाहिए।
ग्रामीणों का मानना है कि यह आयोजन बच्चों और युवाओं के लिए विशेष रूप से प्रेरणास्पद है। जहां एक ओर लोग अपने स्वार्थ में पेड़ों को काट रहे हैं, वहीं ऐसे उदाहरण समाज को जागरूक और प्रेरित करते हैं।
ढोल-नगाड़ों और पारंपरिक लोकगीतों से गूंज उठा गवालू
विवाह समारोह के दौरान गांव के लोक कलाकारों द्वारा पारंपरिक गीत प्रस्तुत किए गए। ढोल-नगाड़ों की थाप और मंगल गीतों की गूंज ने वातावरण को धार्मिक और उत्सवी बना दिया। कार्यक्रम के दौरान फूलों की सजावट, रंगोली, और पारंपरिक तोरण ने इस आयोजन को किसी भव्य विवाह समारोह से कम नहीं बनाया।
पेड़ों को परिवार मानकर करें सेवा
शास्त्री जी ने बताया कि "पेड़ सिर्फ पर्यावरण नहीं बचाते, बल्कि वे हमारी संस्कृति, परंपरा और जीवन का आधार हैं। जब हम उन्हें परिवार का सदस्य मानकर सेवा करेंगे, तभी प्रकृति हमें भरपूर आशीर्वाद देगी।"
समाज में बढ़ती पर्यावरण चेतना की जरूरत
इस आयोजन से यह स्पष्ट संदेश गया है कि अगर हर व्यक्ति कम से कम एक वृक्ष लगाकर उसकी सेवा करे, तो पर्यावरण की बिगड़ती स्थिति में बड़ा सुधार आ सकता है। ग्रामवासियों ने भी संकल्प लिया कि वे आने वाले समय में अपने-अपने घरों के बाहर वृक्षारोपण करेंगे और उनकी देखभाल को प्राथमिकता देंगे।
गवालू गांव का यह वृक्ष विवाह समारोह न केवल एक अनूठा आयोजन था, बल्कि एक आंदोलन की शुरुआत है। यह बताता है कि व्यक्तिगत प्रयासों से भी बड़े सामाजिक बदलाव लाए जा सकते हैं। कैलाश शास्त्री जी का यह उदाहरण संपूर्ण देश के लिए प्रेरणादायक है।
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