Saturday, April 26, 2025

भजन 

आओ भोग लगाओ मेरे प्रभु 

प्रेम से भोग लगाओ मेरे प्रभु जी


1. सबरी के बेर, सुदामा के चावल 

रूच रूच भोग लगाओ मेरे प्रभु जी..


2. दुर्योधन के मेवा त्यागे 

साग विदुर घर खायो मेरे प्रभु जी..


3. बड़े प्रेम से भोग बनायो 

छप्पन भोग लगाओ मेरे प्रभु जी.

Friday, April 18, 2025

 डोकरा बाबा: गवालू गांव के संत की अद्भुत गाथा


भूमिका

राजस्थान के गवालू गांव में स्थित संत डोकरा बाबा का मंदिर आस्था और चमत्कार का केंद्र माना जाता है। डोकरा बाबा का जन्म ब्राह्मण समाज में खंडेलवाल(झुनझुनोदिया)गोत्र में हुआ था। उन्होंने अपने जीवन में निस्वार्थ सेवा और तपस्या का मार्ग अपनाया। उनकी प्रेरणादायक गाथा आज भी ग्रामीणों की श्रद्धा और विश्वास का प्रतीक बनी हुई है।


डोकरा बाबा की तप



स्या और कुएं की कथा


कहते हैं कि डोकरा बाबा रोज़ सुबह जल्दी उठकर कुएं से पानी भरकर ले जाते थे। एक दिन जब वे देर से उठे, तो उन्होंने अपनी पत्नी को पानी लाने के लिए भेजा। लेकिन गांव वालों ने पानी देने से इनकार कर दिया और ताना मारा कि "अगर ज्यादा पानी चाहिए तो अपना कुआं खुद खुदवा लो।"


यह सुनकर डोकरा बाबा ने संकल्प लिया कि वे अपना कुआं खुद खोदेंगे। बिना जल और अन्न ग्रहण किए, केवल अपनी गाय के दूध पर जीवित रहकर, वे 40 दिनों तक लगातार खुदाई करते रहे। अंततः, उनकी कठिन तपस्या सफल हुई, और कुएं से शुद्ध जल निकला।


परंतु, इसी कुएं के अंदर बाबा ने समाधि ले ली और उनकी मृत्यु के बाद भी यह स्थान चमत्कारों से भरा रहा।


चमत्कारों की कहानियां


ग्रामीणों के अनुसार, यह कुआं कई चमत्कारी घटनाओं का साक्षी रहा है।


एक महिला कुएं में गिर गई, लेकिन उसे एक खरोंच तक नहीं आई।


कुछ समय बाद, एक बकरी भी कुएं में गिरी और सुरक्षित बाहर निकल आई।


ऐसा माना जाता है कि जो भी किसी रुकावट से परेशान हो, वह सच्चे मन से सात दिनों तक परिक्रमा करता है तो उसकी सभी बाधाएं दूर हो जाती हैं।



मंदिर का निर्माण और वृक्षारोपण


ग्रामीणों ने मिलकर डोकरा बाबा का भव्य मंदिर बनवाया, और मंदिर के चारों ओर तीन तरह के पेड़ (20 फीट, 40 फीट और 60 फीट ऊंचाई के) लगाए। इस स्थान पर कुल 40,000 पेड़ लगाए गए हैं, जिससे यह क्षेत्र हरियाली से भर गया है।


डोकरा बाबा की मूर्ति की खोज


जब इस पवित्र स्थान की खुदाई की गई, तो यहां से 400-500 साल पुरानी डोकरा बाबा की मूर्ति प्राप्त हुई। यह मूर्ति आज भी मंदिर में स्थापित है और भक्तों के लिए आस्था का केंद्र बनी हुई है।


डोकरा बाबा की सीख और संदेश


डोकरा बाबा का जीवन हमें संघर्ष, आत्मनिर्भरता और तपस्या की सीख देता है। उनकी कहानी बताती है कि कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य और समर्पण से हम अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं।


निष्कर्ष


ग्वालु गांव में स्थित डोकरा बाबा का मंदिर एक आध्यात्मिक शक्ति केंद्र बन चुका है। यहां दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं और उनकी परिक्रमा कर मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। डोकरा बाबा का जीवन हमें यह संदेश देता है कि अगर हम निश्चय कर लें, तो किसी भी कठिनाई को पार कर सकते हैं।


डोकरा बाबा: तपस्या, आस्था और चमत्कार की अद्भुत गाथा


ग्वालु गांव के संत जिन्होंने 40 दिनों में बिना जल-अन्न के खुदाई कर निकाला जल


समाधि लेने के बाद भी कुएं से जुड़े चमत्कार, श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र


मंदिर के चारों ओर 40,000 वृक्ष, 400-500 साल पुरानी मिली डोकरा बाबा की मूर्ति

Saturday, April 12, 2025

 *हनुमान जयन्ती विशेष*


   


      *हमारे आराध्य देवों के योगविशेष में आने वाले जन्मदिन को जन्मोत्सव की अपेक्षा "जयन्ती" शब्द से अभिहित करना अधिक गुरुतर विलक्षण रहस्यमयी और श्रेयस्कर है।"*




हनुमत् ध्यानम्-


*दूरीकृत सीतार्तिः, प्रकटीकृत राम वैभव स्फूर्तिः।*


*दारितदशमुखकीर्तिः,पुरतो मम भातु हनुमतो मूर्तिः।।*




      हमारे आराध्य आञ्जनेय विद्यावान् वज्रांगबली के प्राकट्योत्सव "हनुमज्जयन्ती" पर सभी अपनों को मंगलमयी सुमंगली मंगलकामनाएँ..




      किसी भी देवी-देवता के प्रामाणिक एवं प्रसिद्ध जन्मदिन को "जयन्ती" कहें तो विशेष फलदायी होता है। जयन्ती निमित्त किये गये व्रतादि से अनन्त पुण्यों का अभ्युदय होता है। जयन्ती का प्रामाणिक अर्थ मास तिथि नक्षत्र वारादि के विशेष संयोग से युक्त जयन्ती दिवस है। 




      ऐसे ही सनातन धर्म संस्कृति में मत्स्य जयन्ती, कुर्म जयन्ती, वाराह जयन्ती, वामन जयन्ती, नृसिंह जयन्ती, कल्कि जयन्ती, राधा जयन्ती श्री कृष्ण जन्माष्टमी विशेष योग से जयन्ती ही प्रसिद्ध है। इन के लिए शास्त्रों में जन्मदिन या जन्मोत्सव शब्द का प्रयोग नहीं हुआ है।




स्कन्द पुराण में कहा है-


*महाजयार्थं कुरुतां जयन्ती मुक्तयेऽथवा।*


*धर्ममर्थं च कामं च मोक्षं च मुनिपुंगव।*


*ददाति वाञ्छितानर्थान् ये चान्येऽप्यतिदुर्लभा:।।*




      *जैसे कृष्णजन्माष्टमी के दिन अर्धरात्रि में अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र का संयोग हो तो वह कृष्ण *जयन्ती* कहलाती है।* 




      अष्टमी को रोहिणी नक्षत्र बुधवार या सोमवार आ रहा हो, सूर्योदय से पूर्व नवमी तिथि स्पर्श कर रही हो और पूर्णिमान्त भाद्रपद कृष्ण पक्ष का महिना हो (अमान्त श्रावण कृष्ण पक्ष मास हो) तो कोटि-कोटि पापों का नाश करने वाला, प्रेतत्व से मुक्ति देने वाला और अगणित पुण्यों की अभिवृद्धि करने वाला श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रत "जयन्ती" व्रत कहलाता है। ऐसा पद्मपुराण में कहा गया है। 


      कतिपय विद्वान् सोमवार के स्थान पर सोम अर्थात् अर्धरात्रि में चन्द्रोदय की उपस्थिति को ग्रहण करते हैं।




       चैत्र शुक्ला पूर्णिमा को माता अंजना के गर्भ से रामभक्त हनुमान जी का प्राकट्य हुआ था। अतः इसी दिन भगवान के जन्मदिन महोत्सव को "हनुमान जयन्ती" रूप में मनाया जाना चाहिए। व्रतरत्नाकर उत्सवसिन्धु आदि ग्रंथों में भी हनुमान जयंती अभिहित है। कुछ क्षेत्रों में बैशाख शुक्ला पूर्णिमा के दिन हनुमान जयंती को मारुति जन्मोत्सव के रुप में मनाते हैं।




आचार्य श्री नीलकण्ठ ने अपने प्रबन्ध ग्रन्थ *भगवन्त भास्कर* में स्कन्दपुराण के वचनों को उद्धृत करते हुए जयन्ती शब्द का अर्थ कहा है-




*जयं पुण्यं च कुरुते जयन्तीं तां विदुर्बुधा:।*


पाठान्तर-


*जयं पुण्यं च कुरुते जयन्तीमिति तां विदुः।*




      विशेष योगादि से युक्त भगवान के जन्मदिन को विद्वज्जनों ने "जयन्ती" कहा है। "जयन्ती" जय और पुण्य को प्रदान करती हैं। इसलिए हनुमान जयन्ती ही कहना चाहिए। हम कहें कुछ भी पर जयन्ती अधिक श्रेयस्कर है।




      शास्त्रों में कार्तिक कृष्णा चतुर्दशी को भी हनुमान जी की जयन्ती मनाने के प्रसंग हैं --


*आश्विनस्यासिते पक्षे भूतायां च महानिशि।*


*भौमवारेऽञ्जनादेवी हनूमन्तमजीजनत्।।*




      *अमान्त आश्विनस्यासिते* का अर्थ कार्तिक कृष्ण पक्ष है। भूततिथि अर्थात् चतुर्दशी की मध्यरात्रि मंगलवार को माता अंजना के गर्भ से हनुमानजी का जन्म हुआ। अञ्जना मां अञ्जन से भी अधिक श्यामा थीं।




       और कहते हैं कि कार्तिक कृष्णा 14 को सीताजी ने अपना सौभाग्य द्रव्य सिन्दूर हनुमान जी को प्रदान किया था तब से ही हनुमान जयंती मनाई जाने लगी है। 






और भी कहा है कि-


*स्वात्यां कुजे शैवतिथौ तु कार्तिके कृष्णेSञ्जनागर्भत एव मेषके।*


*श्रीमान् कपीट्प्रादुरभूत् परन्तपो व्रतादिना तत्र तदुत्सवं चरेत्॥*




हनुमान जी का जन्म कल्प भेद से भिन्न-भिन्न तिथियों में कहा गया है।




     आजकल जन सामान्य में भ्रान्ति है कि जयन्ती शब्द भगवान के जन्मोत्सव के लिए प्रयुक्त करना शुभ नहीं है। लोगों की मान्यता है कि जयन्ती शब्द तो मृत व्यक्ति के जन्मदिन के लिए या पुण्यतिथि के लिए प्रयुक्त होता है। जैसा कि आजकल शासकीय आदेशों में महापुरुषों के जन्म दिवस को गांधी जयंती सुभाष जयंती आदि कहा जाता है। हां यहां जो जयन्ती शब्द का प्रयोग हुआ है वह अवश्य शास्त्र विरुद्ध है। प्रयोग कोई कुछ भी करें। सब स्वतन्त्र हैं।

Thursday, April 10, 2025

 यदि हमारे पूर्वजो को हवाई जहाज बनाना नहीं आता, तो हमारे पास "विमान" शब्द भी नहीं होता। 


यदि हमारे पूर्वजों को Electricity की जानकारी नहीं थी, तो हमारे पास "विद्युत" शब्द भी नहीं होता। 


यदि "Telephone" जैसी तकनीक  प्राचीन भारत में नहीं थी तो,  "दूरसंचार" शब्द हमारे पास क्यो है। 


Atom और electron की जानकारी नहीं थी तो अणु और परमाणू शब्द कहा से आए। 


Surgery का ज्ञान नहीं था तो, "शल्य चिकितसा" शब्द कहा ये आया। 


विमान,  विद्युत, दूरसंचार ,  ये शब्द स्पष्ट प्रमाण है, कि ये तकनीक भी हमारे पास थी। 


फिसिक्स के सारे शब्द आपको हिन्दी में मिल जाएगे। 


बिना परिभाषा के कोई शब्द अस्तित्व में रह नहीं सकता। 


सौरमंडल में नौ ग्रह है व सभी सूर्य की परिक्रमा लगा रहे है, व बह्ममांड अनंत है, ये हमारे पूर्वजो को बहुत पहले से पता था। रामचरित्र मानस में काक भुशुंडि - गरुड संवाद पढिए, बह्ममांड का ऐसा वर्णन है, जो आज के विज्ञान को भी नहीं पता।


अंग्रेज जब 17-18 सदी में भारत आये तभी उन्होने विज्ञान सीखा,  17 सदी के पहले का आपको कोई साइंटिस्ट नहीं मिलेगा,  


17 -18 सदी के पहले कोई अविश्कार यूरोप में नहीं हुआ, भारत आकर सीखकर, और चुराकर अंग्रेजो ने अविश्कार करे। 


भारत से सिर्फ सोने चांदी की ही लूट नहीं हुई, ज्ञान के भंडार की भी लूट हुई है। 


वेद ही विज्ञान है और हमारे ऋषि ही वैज्ञानिक है


[जय सनातन संस्कृति ]

 सूर्य सहस्त्रनाम का पाठ करने से जीवन में मान सम्मान, यश कीर्ति, धन दौलत, स्वास्थ्य, संतान, भोग और मोक्ष सभी प्राप्त होते हैं। 


रविवार के दिन शक्ति, सेहत और आरोग्य का वरदान देने वाली सूर्य की पूजा का बहुत महत्व है। प्रत्यक्ष देवता भगवान सूर्य को सृष्टि का प्राण कहा गया है। 


प्रतिदिन साक्षात दर्शन देने वाले भगवान सूर्य के कारण ही पृथ्वी पर जीवन है। सूर्य की साधना को हिन्दू पंरपरा में अत्यंत आवश्यक मानते हुए पुण्य दायी माना गया है, उसी सूर्य की किरणों से मिलने वाले लाभ को विज्ञान ने भी आवश्यक माना है, क्योंकि सूर्य हमें स्वस्थ रखते हुए हमारे सौंदर्य को भी बढ़ता है। 


प्रतिदिन सूर्योदय से पूर्व ही शैया त्यागकर शौच –स्नान करना चाहिए


सूर्य की साधना करने के लिए सूर्योदय से पहले उठने का प्रयास करें और शौच आदि से निवृत्त होकर सबसे पहले सूर्यदेव को अर्घ्य देकर तीन बार प्रणाम करें।


सूर्य के साधक को प्रतिदिन उनके शतनाम और स्तोत्र अथवा सहस्त्रनाम का श्रद्धा पूर्वक पाठ करना चाहिए तथा उनके मंत्र का जाप करना चाहिए। सूर्य के साधक को प्रतिदिन आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ अवश्य करना चाहिए. इसका पाठ करने से भगवान सूर्यदेव की कृपा शीघ्र ही प्राप्त होती है।


सूर्य के साधक को सूर्यदेव की विशेष कृपा पाने के लिए रविवार के दिन विधि-विधान से व्रत रखना चाहिए और रविवार के दिन तेल, नमक आदि नहीं खाना चाहिए।

 

सूर्य के साधक को रविवार का व्रत करते हुए ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए।


सूर्यदेव की कृपा पाने के लिए प्रतिदिन श्रीखंड, चंदन अथवा रक्त चंदन का तिलक लगाएं।


यदि आपकी कुंडली में सूर्य अशुभ फल दे रहा है तो, आप उसकी शुभता को पाने के लिए अपने गले तांबे का सिक्का धारण करें। तांबे के सिक्के को लाल धागे में ही धारण करें। 


ज्योतिष में सूर्य से जुड़ी अशुभता को दूर और शुभता को प्राप्त करने के लिए रविवार के दिन गेहू, तांबा, घी, स्वर्ण और गुड़ के दान का उपाय बताया गया है।


यदि आप चाहते हैं कि, आपकी आंखें हमेशा स्वस्थ रहें या फिर आंखों से जुड़ी किसी बीमारी शीघ्र ही दूर हो तो उसके लिए अपनी आंखों का इलाज कराते हुए सूर्य की साधना भी प्रतिदिन करें। नेत्ररोग से बचने और उसकी रक्षा के लिए प्रतिदिन नेत्रोपनिषद का श्रद्धापूर्वक पाठ करना चाहिए।


सूर्य देव को प्रणाम करने से क्या होता है ?


सुबह सवेरे उगते हुए सूर्य को प्रणाम करने और दर्शन करने से हमारे शरीर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, हमारी दिनचर्या नियमित बनती है, कारोबार एवं नौकरी में सफलता प्राप्त होती है, इसके लिए प्रातः काल उठकर सूर्यदेव को नमन करना चाहिए।


सूर्य सिद्धि कैसे करें ?


शास्त्रों की मान्यता के अनुसार सूर्योदय के प्रथम किरण में सूर्यदेव को अर्घ्य देना सबसे उत्तम माना गया है। इसके लिए सर्वप्रथम प्रात:काल सूर्योदय से पूर्व नित्य-क्रिया से निवृत्त्य होकर स्नान करें, उसके बाद उगते हुए सूर्य के सामने आसन लगाए, पुनः आसन पर खड़े होकर तांबे के पात्र में पवित्र जल लें।


सूर्य देव को कौन सी वस्तु चढ़ाने से प्रसन्न होते हैं ?


माना जाता है प्रसाद में मिश्री चढ़ाने से भगवान प्रसन्न होते हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, सूर्य को अर्घ्य देते समय जल में मिश्री डालकर जल चढ़ाने से सूर्य देवता की कृपा बनी रहती है।


सूर्य को एक्टिवेट कैसे करें ?


अपने सरलतम रूप में, यह सूर्य भेदन प्राणायाम अभ्यास दाएं नथुने से सांस लेकर, सांस रोककर और बाएं नथुने से सांस छोड़कर किया जाता है। दायां नथुना पिंगला नाड़ी से जुड़ा होता है - शरीर में एक ऊर्जावान चैनल जो मूलाधार चक्र से शुरू होता है, और दाएं नथुने में समाप्त होता है।


सूर्य भगवान को जल में गुड़ डालकर चढ़ाने से क्या होता है ?


यदि आप किसी बीमारी से परेशान हैं तो ऐसे में सूर्य देव को जल में गुड़ मिलाकर चढ़ाना बहुत ही शुभ होता है। ऐसा करने से बीमारियों से राहत मिलती है। वहीं अगर किसी व्यक्ति को नींद आने में परेशानी या ब्लड प्रेशर की समस्या है तो, उसे जल में कच्चा दूध मिलाकर सूर्य देव को चढ़ाना चाहिए। इससे लाभ मिलता है।


सूर्य को जल कब नहीं देना चाहिए ?


सूर्य की रोशनी जब चुभने लगे तब जल देना अनुकूल नहीं होता है,अर्घ्य देने के बाद मंत्र जाप करने से विशेष लाभ होता है, बिना स्नान किए हुए अर्घ्य नहीं देना चाहिए।


सूर्य को जल देने वाले लोटे में क्या डालें ?


भविष्य पुराण के अनुसार रोज सुबह स्नान के बाद भगवान सूर्य को जल अर्पित करना चाहिए। इसके लिए तांबे के लोटे में जल भरें, इसमें चावल, फूल डालकर सूर्य को अर्घ्य अर्पित करना चाहिए। जल अर्पित करते समय सूर्य मंत्र का जाप करें। इस जाप के साथ शक्ति, बुद्धि, स्वास्थ्य और सम्मान की कामना करना चाहिए।


सूर्य देवता के चमत्कारी इक्कीस नाम का नित्य पाठ करने से जीवन में चमत्कारी परिवर्तन होते हैं।


1. विकर्तन, 2. विवस्वान, 3.मार्तण्ड, 4. भास्कर, 5. रवि


6. लोकप्रकाशक, 7. श्रीमान, 8. लोकचक्षु, 9. महेश्वर, 10. लोकसाक्षी, 11. त्रिलोके, 12. कर्ता, 13. हर्ता

14. तमिस्रहा, 15. तपन, 16. तापन, 17. शुचि,

18. सप्ताश्ववाहन, 19. गभस्तिहस्त, 20. ब्रह्मा, 

21. सर्वदेवनमस्कृत।


अनुष्टुप छ्न्द शपर आधारित ये ढाई श्लोक हैं, जिनका एक बार पठन सहस्र सूर्य नाम जप के समान फलदायी है। ये ढाई श्लोक किसी स्तोत्र से कम नहीं है। इन श्लोकों को भलि भांति कण्ठस्थ करके और सुबह शाम इसके पाठ का नियम बना लेना चाहिये।


सूर्य देव को अपने अनुकूल बनाने के लिए नियमित रूप से सूर्य कवच, सूर्य स्तोत्र, सूर्य सहस्त्रनाम और मंत्रों का विधि पूर्वक होकर जाप करना चाहिए।


नोट:---यदि आपकी जन्म कुंडली में उपरोक्त कोई समस्या है तो, आप अपनी जन्म कुंडली अवश्य दिखाएं और बताए हुए उपाय कीजिए, निश्चित रूप से आपको लाभ होगा, जीवन में चल रही परेशानियों से छुटकारा मिलेगा।

 श्रीसंकटमोचन

     काले हनुमानजी

         की आरती:-

🌹🌹🌹🌹🌹

अतुलितबलधामं

कृष्णशैलाभदेहम्,

 दनुजवनकृशानुं

विघ्नविच्छेदहेतुम्।

स्मरतिहृदिहरिं स

धारयन्तं गदां च

रघुपति प्रिय भक्तं

त्वांजनेयं नमामि।।

           🕉️

जय अंजनि नन्दन,

        कलुष विभंजन,

श्याम रूप हनुमाना।

भक्तन रखवारे,

           असुर संहारे,

   धारे काला बाना।।

अहिरावण मारे,

           भुजा उपारे ,

रावणकुल कियो अंता

हौं शरणहिं आयो,

   अति सुख पायो ,

पायो कपि बलवंता।।

        ।।टेर।।

अतुलित बल धामा ,

         हिय सियरामा,

आश्रय दो कपि काले,

तुम सुत सियकंता,

        कलि भगवन्ता,

 सोहत रूप निराले।

सब शत्रु विनासी,

          काशी वासी,

संकटमोचन नामा।

मथुरा अपनावहुँ,

         राम मिलावहुँ,

कृष्ण रंग रसधामा।।

         ।।टेर।।

 महावीर जयन्ती 

हनुमान जयन्ती 

परशुराम जयन्ती 

कृष्ण जन्माष्टमी - जयन्ती विशेष संज्ञा है 

मत्स्य जयन्ती 

कुर्म जयन्ती 

वाराह जयन्ती

कल्कि जयन्ती 


भगवान के जन्मोत्सव को जयन्ती ही कहा गया है शास्त्रों में।


आजकल कुछ ज्यादा पढ़े लिखे लोग जयन्ती का अर्थ हल्के में लेते हैं। 


सामान्य व्यक्ति के जन्मदिन से इसे नहीं जोड़ें।


जयन्ती शब्द  जन्मोत्सव से अधिक प्रभावी और गम्भीर है।


कथाव्यास कैलाश जी शास्त्री 

श्री राधे ज्योतिष दरबार, शास्त्री नगर, गवालू (नागौर) राज.

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